چهارشنبه ۲۹ بهمن ۱۴۰۴ ایران ۱۳:۱۸
| الا ای آهوی وحشی کجايی | | مرا با توست چندين آشنايی |
| دو تنها و دو سرگردان دو بيکس | | دد و دامت کمين از پيش و از پس |
| بيا تا حال يکديگر بدانيم | | مراد هم بجوييم ار توانيم |
| که میبينم که اين دشت مشوش | | چراگاهی ندارد خرم و خوش |
| که خواهد شد بگوييد ای رفيقان | | رفيق بيکسان يار غريبان |
| مگر خضر مبارک پی درآيد | | ز يمن همتش کاری گشايد |
| مگر وقت وفا پروردن آمد | | که فالم لا تذرنی فردا آمد |
| چنينم هست ياد از پير دانا | | فراموشم نشد، هرگز همانا |
| که روزی رهروی در سرزمينی | | به لطفش گفت رندی رهنشينی |
| که ای سالک چه در انبانه داری | | بيا دامی بنه گر دانه داری |
| جوابش داد گفتا دام دارم | | ولی سيمرغ میبايد شکارم |
| بگفتا چون به دست آری نشانش | | که از ما بینشان است آشيانش |
| چو آن سرو روان شد کاروانی | | چو شاخ سرو میکن دیدهبانی |
| مده جام می و پای گل از دست | | ولی غافل مباش از دهر سرمست |
| لب سر چشمهای و طرف جويی | | نم اشکی و با خود گفت و گويی |
| نياز من چه وزن آرد بدين ساز | | که خورشيد غنی شد کيسه پرداز |
| به ياد رفتگان و دوستداران | | موافق گرد با ابر بهاران |
| چنان بيرحم زد تيغ جدايی | | که گويی خود نبودهست آشنايی |
| چو نالان آمدت آب روان پيش | | مدد بخشش از آب ديدهی خويش |
| نکرد آن همدم ديرين مدارا | | مسلمانان مسلمانان خدا را |
| دل ميرود ز دستم صاحب دلان خدا را |
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| دردا كه راز پنهان خواهد شد آشكارا |
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| كشتي شكستگانيم اي باد شرطه برخيز |
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| باشد كه بازبينيم ديدار آشنا را |
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| ده روزه مهر گردون افسانه است و افسون |
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| نيكي به جاي ياران فرصت شمار يارا |
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| در حلقه گل و مل خوش خواند دوش بلبل |
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| هات الصبوح هبوا يا ايها السكارا |
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| اي صاحب كرامت شكرانه سلامت |
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| روزي تفقدي كن درويش بينوا را |
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| آسايش دو گيتي تفسير اين دو حرف است |
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| با دوستان مروت با دشمنان مدارا |
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| در كوي نيك نامي ما را گرر ندادند |
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| گر تو نميپسندي تغيير كن قضا را |
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| آن تلخ وش كه صوفي ام الخبائثش خواند |
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| اشهي لنا و احلي من قبله العرارا |
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| هنگام تنگدستي در عيش كوش و مستي |
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| كاين كيمياي هستي قارون كند گدا را |
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| سركش مشو كه چون شمع از غيرتت بسوزد |
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| دلبر كه در كف او موم است سنگ خارا |
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| آيينه سكندر جام مي است بنگر |
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| تا بر تو عرضه دارد احوال ملك دارا |
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| خوبان پارسي گو بخشندگان عمرند |
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| ساقي بده بشارت رندان پارسا را |
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| حافظ به خود نپوشيد اين خرقه مي آلود |
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| اي شيخ پاكدامن معرور دار ما را |
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| سينه از آتش دل در غم جانانه بسوخت |
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| آتشي بود در اين خانه كه كاشانه بسوخت |
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| تنم از واسطه دوري دلبر بگداخت |
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| جانم از آتش مهر رخ جانانه بسوخت |
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| سوز دل بين كه ز بس آتش اشكم دل شمع |
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| دوش بر من ز سر مهر چو پروانه بسوخت |
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| آشنايي نه غريب است كه دلسوز من است |
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| چون من از خويش برفتم دل بيگانه بسوخت |
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| خرقه زهد مرا آب خرابات ببرد |
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| خانه عقل مرا آتش ميخانه بسوخت |
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| چون پياله دلم از توبه كه كردم بشكست |
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| همچو لاله جگرم بي مي و خمخانه بسوخت |
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| ماجرا كم كن و بازآ كه مرا مردم چشم |
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| خرقه از سر به درآورد و به شكرانه بسوخت |
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| ترك افسانه بگو حافظ و مي نوش دمي |
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| كه نخفتيم شب و شمع به افسانه بسوخت |
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| اي نسيم سحر آرامگه يار كجاست |
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| منزل آن مه عاشق كش عيار كجاست |
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| شب تار است و ره وادي ايمن در پيش |
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| آتش طور كجا موعد ديدار كجاست |
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| هر كه آمد به جهان نقش خرابي دارد |
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| در خرابات بگوييد كه هشيار كجاست |
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| آن كس است اهل بشارت كه اشارت داند |
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| نكتهها هست بسي محرم اسرار كجاست |
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| هر سر موي مرا با تو هزاران كار است |
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| ما كجاييم و ملامت گر بيكار كجاست |
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| بازپرسيد ز گيسوي شكن در شكنش |
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| كاين دل غمزده سرگشته گرفتار كجاست |
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| عقل ديوانه شد آن سلسله مشكين كو |
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| دل ز ما گوشه گرفت ابروي دلدار كجاست |
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| ساقي و مطرب و مي جمله مهياست ولي |
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| عيش بي يار مهيا نشود يار كجاست |
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| حافظ از باد خزان در چمن دهر مرنج |
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| فكر معقول بفرما گل بي خار كجاست |
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| رواق منظر چشم من آشيانه توست |
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| كرم نما و فرود آ كه خانه خانه توست |
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| به لطف خال و خط از عارفان ربودي دل |
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| لطيفههاي عجب زير دام و دانه توست |
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| دلت به وصل گل اي بلبل صبا خوش باد |
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| كه در چمن همه گلبانگ عاشقانه توست |
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| علاج ضعف دل ما به لب حوالت كن |
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| كه اين مفرح ياقوت در خزانه توست |
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| به تن مقصرم از دولت ملازمتت |
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| ولي خلاصه جان خاك آستانه توست |
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| من آن نيم كه دهم نقد دل به هر شوخي |
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| در خزانه به مهر تو و نشانه توست |
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| تو خود چه لعبتي اي شهسوار شيرين كار |
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| كه توسني چو فلك رام تازيانه توست |
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| چه جاي من كه بلغزد سپهر شعبده باز |
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| از اين حيل كه در انبانه بهانه توست |
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| سرود مجلست اكنون فلك به رقص آرد |
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| كه شعر حافظ شيرين سخن ترانه توست |
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