| گويند كسان بهشت با حور خوش است |
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| من ميگويم كه آب انگور خوش است |
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| اين نقد بگير و دست از آن نسيه بدار |
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| كاواز دهل شنيدن از دور خوش است |
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| گويند مرا كه دوزخي باشد مست |
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| قوليست خلاف دل در آن نتوان بست |
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| گر عاشق و ميخواره بدوزخ باشند |
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| فردا بيني بهشت همچون كف دست |
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| من هيچ ندانم كه مرا آنكه سرشت |
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| از اهل بهشت كرد يا دوزخ زشت |
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| جامي و بتي و بربطي بر لب كشت |
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| اين هر سه مرا نقد و ترا نسيه بهشت |
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| مهتاب بنور دامن شب بشكافت |
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| مي نوش دمي بهتر از اين نتوان يافت |
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| خوش باش و مينديش كه مهتاب بسي |
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| اندر سر خاك يك بيك خواهد تافت |
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| مي خوردن و شاد بودن آيين منست |
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| فارغ بودن ز كفر و دين دين منست |
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| گفتم به عروس دهر كابين تو چيست |
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| گفتا دل خرم تو كابين منست |
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| مي لعل مرابست و صراحي كان است |
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| جسم است پياله و شرابش جان است |
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| آن جام بلورين كه ز مي خندان است |
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| اشكي است كه خون دل درو پنهان است |
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| مي نوش كه عمر جاوداني اينست |
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| خود حاصلت از دور جواني اينست |
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| هنگام گل و باده و ياران سرمست |
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| خوش باش دمي كه زندگاني اينست |
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| نيكي و بدي كه در نهاد بشر است |
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| شادي و غمي كه در قضا و قدر است |
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| با چرخ مكن حواله كاندر ره عقل |
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| چرخ از تو هزار بار بيچارهتر است |
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| در هر دشتي كه لالهزاري بودهست |
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| از سرخي خون شهرياري بودهست |
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| هر شاخ بنفشه كز زمين ميرويد |
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| خالي است كه بر رخ نگاري بودهست |
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| هر ذره كه در خاك زميني بوده است |
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| پيش از من و تو تاج و نگيني بوده است |
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| گرد از رخ نازنين به آزرم فشان |
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| كانهم رخ خوب نازنيني بوده است |
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