یکشنبه ۲۸ دی ۱۴۰۴ ایران ۱۶:۵۷
| ساقيا داني كه مخموريم در ده جام را |
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| ساعتي آرام ده اين عمر بی آرام را |
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| مير مجلس چون تو باشی با جماعت در نگر |
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| خام در ده پخته را و پخته در ده خام را |
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| قالب فرزند آدم آز را منزل شدست |
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| انده پيشی و بيشی تيره كرد ايام را |
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| نه بهشت از ما تهي گردد نه دوزخ پر شود |
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| ساقيا در ده شراب ارغواني فام را |
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| قيل و قال بايزيد و شبلي و كرخی چه سود |
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| كار كار خويش دان اندر نورد اين نام را |
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| تا زماني ما برون از خاك آدم دم زنيم |
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| ننگ و نامي نيست بر ما هيچ خاص و عام را |
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| فتنه را در عالم آشوب و شور |
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| نيستم با درد عشقت لحظهاي |
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| خالي از غمها و از تيمارها |
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| مينهم جان را و دل را خارها |
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| مرد هشيار در اين عهد كمست |
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| زيركان را ز در عالم و شاه |
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| هست پنهان ز سفيهان چو قدم |
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| و آن كه راهست ز حكمت رمقي |
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| خونش از بيم چو شاخ به قمست |
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| و آن كه بيناست درو از پی امن |
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| از عم و خال شرف مر همه را |
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| هر كجا جاه در آن جاه چهست |
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| هر كجا سيم در آن سيم سمست |
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| گر چه اندر سقر اندر ارمست |
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| رسته نزد همه كس فتنه گياه |
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| هر كه را بينی پر باد ز كبر |
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| آن نه از فربهی آن از ورمست |
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| از يكي در نگري تا به هزار |
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| رخ به سيمين برو سيمين صنمست |
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| دل به زور و زر و خيل و حشمست |
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| بهر نان پشت دل و دين به خمست |
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| فقها را غرض از خواندن فقه |
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| قبلهشان شاهد و شمع و شكمست |
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